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    Home » डॉक्टर्स डे पर फ़रीदाबाद के जानें मानें डॉक्टर सुरेश अरोड़ा के ये लेख जरूर पढ़ें

    डॉक्टर्स डे पर फ़रीदाबाद के जानें मानें डॉक्टर सुरेश अरोड़ा के ये लेख जरूर पढ़ें

    Ajay vermaBy Ajay verma30/06/2023No Comments4 Mins Read
    Believe in the lives of the bones of Faridabad on Doctor's Day, must read this article by Dr. Suresh Arora
    डॉ. सुरेश अरोड़ा ( M.S. Ortho ) सूर्य आर्थो एंड ट्रामा सेंटर

    टुडे एक्सप्रेस न्यूज़ । आपको बता दें कि 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है ।डॉक्टर्स डे पर, मै डॉ. सुरेश अरोड़ा मरीज़ के रिश्तों की बढ़ोतरी और डॉक्टरों के विरुद्ध हिंसा की कमी बारे में अपने विचार आपके साथ साझा करना चाहता हूं।

    भारत सरकार ने 1991 में 1 जुलाई को डॉक्टर दिवस के रूप में घोषित किया ताकि मरीज अपने डॉक्टरों को उनकी सेवाओं के लिए धन्यवाद दे सकें। आज के समय में, जबकि आवश्यकता है कि डॉक्टर और रोगी के बीच रिश्ते अच्छे होने चाहिए,मगर ऐसा देखा जा रहा है कि ये समय के साथ कम होते जा रहे हैं और हिंसा की वारदाते भी बढ़ती जा रही है,यह समाज के साथ-साथ चिकित्सा पेशेवरों के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है। युवा नवोदित मेडिकल छात्र अपने अध्ययन डेस्क पर बैठे हैं और अभी से ही अपने भविष्य के लिए बहुत आशंकित हैं।

    मैं अपने सुझावों को पांच पक्षों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहता हूं।
    1- पेशेंट
    2-फिजिशियन यानी डॉक्टर,
    3-पॉलिटीशियन/ सरकार ,
    4-पुलिस / प्रशासन,
    5-प्रेस / मीडिया

    1) मरीज- डॉक्टर-मरीज का रिश्ता विश्वास पर निर्भर करता है और मरीज हमेशा डॉक्टर से पूरी तरह से ठीक होने की उम्मीद करते हैं, खासकर अगर वे उसका भुगतान कर रहे हैं।लेकिन यह हमेशा डॉक्टर के हाथ में नहीं होता है। इसलिए जब भी प्रतिकूल परिणाम होते हैं, तो रोगी या उसके रिश्तेदार विश्वास खो देते हैं और कई बार गुस्सा भी करते हैं और हिंसा में लिप्त हो जाते हैं। वह कॉम्प्लिकेशन और गलती में फर्क नहीं समझते।
    यहीं पर यह आवश्यक है कि यदि रोगी या उसके रिश्तेदार सोचते हैं कि यदि डॉक्टर ने कोई गलती की है, तो उन्हें कानून को अपने हाथों में लेने के बजाय उचित रास्ते से संपर्क करना चाहिए, जैसे कि न्यायालय,मेडिकल बोर्ड। हिंसा इसका उत्तर नहीं है।
    2) चिकित्सक- यह सच है कि कोई भी डॉक्टर नहीं चाहता है कि उसके रोगी में सुधार न हो, विशेषकर प्रतिस्पर्धा के इस युग में, हर डॉक्टर अपने रोगियों को बचाने की पूरी कोशिश करता है लेकिन फिर भी कभी-कभी गलतियाँ हो सकती हैं।
    यहां ये भी जरूरी है कि डॉक्टरों द्वारा भी आत्मनिरीक्षण करने की आवश्यकता है।
    व्यवहार में सुधार, संकट में कैसे संभाला जाये, अन्य मुद्दे हैं ,जहां विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। एनएमसी ने पहले ही इन मुद्दों के लिए एमबीबीएस के पाठ्यक्रम में इन विषयों को जोड़ दिया है।

    3) राजनेता / सरकार- सरकार की बड़ी भूमिका है। यह सच है कि सरकार के लिए जनता बहुत महत्वपूर्ण है ,लेकिन डॉक्टर भी समाज के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए सरकार को भी डॉक्टरों का समान रूप से समर्थन करना चाहिए। निश्चित रूप से सरकार को एसे कानून बनाने चाहिए ताकि डॉक्टर ईमानदारी से और कुशलता से अपने कर्तव्यों का पालन करें। लेकिन दूसरी और ऐसे बहुत सख्त कानून भी होने चाहिए ताकि लोग डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा न कर सके ।
    सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि डॉक्टरों के काम करने के लिए सुरक्षित वातावरण हो। सरकार द्धारा डॉक्टरों को सीपीए के दायरे में लाने से भी डॉक्टर अब कठिन बीमारियों का इलाज करने में कतराने लगे हैं। ये बात भी सरकार को ध्यान में लानी पड़ेगी।
    4) पुलिस / प्रशासन- ये प्रवर्तन एजेंसियां है।अधिनियमित कानूनों को जमीनी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। यह देखा जाता है कि जब भी डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा होती है, तो हिंसा करने वालों के खिलाफ आसानी से केस दर्ज नहीं होते हैं; बल्कि जनता के प्रति हमेशा सहानुभूति रहती है।
    दोनों पक्षों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण होना चाहिए।
    5) प्रेस / मीडिया- अंत में, मैं सबसे महत्वपूर्ण पहलू पर आता हूं। डॉक्टर-मरीज के रिश्ते को बेहतर बनाने में उनकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है।
    जब भी किसी रोगी के साथ कोई हादसा होता है, तो मीडिया को दोनों के दृष्टिकोण को बराबर से बिना पक्षपात के दिखाना चाहिए। यहां मैं मीडिया कर्मियों से अनुरोध करूंगा कि कृपया डॉक्टर मरीज़ के रिश्ते के हित में विचार करें। कोई भी डॉक्टर किसी भी मामले को खराब नहीं करना चाहता। हमें हमेशा जटिलता और लापरवाही के बीच अंतर पर विचार करना चाहिए।

    यदि ये पांचों पक्ष एक साथ आते हैं और सकारात्मक दिशा में काम करते हैं, तो निश्चित रूप से भविष्य में डॉक्टर-रोगी रिश्ते बेहतर हो सकते है और हिंसा में कमी आ सकती है।

    डाक्टर सुरेश अरोडा
    पूर्व प्रधान
    आईएमए
    फरीदाबाद

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