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    Home » भारतीय शिक्षण मंडल का राष्ट्रीय अधिवेशन शिक्षाविदों ने वर्तमान शिक्षा की कुरीतियों पर विशद विमर्श किया।

    भारतीय शिक्षण मंडल का राष्ट्रीय अधिवेशन शिक्षाविदों ने वर्तमान शिक्षा की कुरीतियों पर विशद विमर्श किया।

    Ajay vermaBy Ajay verma25/11/2018No Comments5 Mins Read

    TODAY EXPRESS NEWS : फरीदाबाद, 25 नवम्बर – भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन का विचार सत्र वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के समालोचनात्मक विश्लेषण और सुधारात्मक उपायों हेतु समर्पित रहा। देश के विख्यात शिक्षाविदों के व्याख्यान के उपरांत व्यापक विचार विमर्श हेतु एक विशेष ‘विचार सत्र’ का आयोजन भी किया गया जिसमें वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की कुरीतियों और उनके निस्तारण पर सभी शिक्षाविदों ने अपने सुझाव दिए।

    नियमित दैनिक सत्रों के पश्चात 9 बजे से ‘विचार सत्र’ का प्रारंभ हुआ जिसमें प्रोफेसर अशोक मोदक, राष्ट्रीय प्रोफेसर, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकारय भारतीय शिक्षण मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा कुशाभाऊठाकरे पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रायपुर के पूर्व कुलपति डॉ. सच्चिदानंद मिश्र जो कि वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली के सदस्य सचिव हैं ने अपने सारगर्भित विचार रखे. इस सत्र की अध्यक्षता कर्णाटक प्रदेश के संस्कृत के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री डॉ. रामचंद्र भट्ट ने किया।
    प्रो. मोदक ने ‘भारतीय शिक्षा का उन्नत इतिहास’ विषय पर अपने विचार रखे जिसमें उन्होंने ब्रिटिश काल से पूर्व भारत में शिक्षा व्यवस्था का सप्रमाण वर्णन करते हुए यह सिद्ध किया कि अंग्रेजों के शासन से पूर्व भारत की शिक्षा व्यवस्था मात्र दर्शन में ही नहीं बल्कि चिकित्सा, तकनीकी, गणित,धातु विज्ञान आदि विषयों में भी यूरोप से बहुत आगे थी. उन्होंने अपने विचारों की पुष्टि के लिए प्रसिद्ध लेखकों जैसे धरमदास, क्लाउडअल्वारिस, कपिल कपूर, और स्वामी विवेकानंद की पुस्तकों से उद्धरण भी दिए. “विवेकानंद ने कहा है कि ज्ञान और सूचना में बहुत अंतर होता है. शिक्षा का मूल उद्देश्य राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण होना चाहिए. पश्चिम की अवधारणा है कि ज्ञान एक शक्ति है लेकिन भारत की अवधारणा है कि ज्ञान मुक्ति का साधन है. यहाँ मुक्ति व्यापक अर्थ में है जिसमें की गरीबी, अज्ञानता आदि भौतिक समस्याओं से मुक्ति भी सम्मिलित है. भारत में इतिहास पाठ्यक्रम लेखन के पक्षपातपूर्ण परिप्रेक्ष्य की समालोचना करते हुए उन्होंने मनोविज्ञान में हो रहे प्रयोगों को भी उधृत किया जिससे कि शिक्षा के भारतीय दृष्टिकोण को मान्यता मिल रही है.
    डॉ. सच्चिदानंद मिश्र ने ‘शिक्षा में संगठन की आवश्यकता’ पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि संपूर्ण भारत कभी भी गुलाम नहीं रहा लेकिन हमें यही इतिहास पढाया जाता है. हमारे पूर्वजों की उपलब्धियों को इतिहास के पाठ्यक्रम में कोई स्थान नहीं दिया गया.कल्हण की राजतरन्गिनी जिसमें महाराज ललितादित्य का वर्णन है उसको इतिहास में कोई जगह नहीं मिली. शिक्षा में गुणात्मक सुधार हेतु संगठन को हर स्तर पर मजबूत और सक्षम बनाना होगा.उन्होंने जो देकर कहा कि दायित्ववानऔर समर्पित कार्यकर्तासंगठन की धुरी हैं. शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि वह युवाओं को समाज और राष्ट्र से जोड़ सके.
    डॉ. रामचंद्र भट्ट ने कहा कि कुलावतंत्र ग्रन्थ में आचार्य के 14 गुण बताये गए हैं जिसे वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में समाहित करना चाहिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि व्यक्ति के सीखने के कई अवस्थायें होती है जिसमे कि आनंदमय अवस्था सर्वोच्च है जिसमे व्यक्ति सीखने में आनंद का अनुभव करता है. उन्होंने अपने शोध के आधार पर सीखने के ‘नचिकेता प्रतिमान’ को भी प्रस्तुत किया.
    अगला ‘विचार सत्र’ शाम के 4 बजे शुरू हुआ जिसकी अध्यक्षता भारतीय शिक्षण मंडल के अखिल भारतीय संघठन मंत्री और प्रख्यात शिक्षाविद श्री मुकुल कानिटकरने किया. इस सत्र में वर्तमान शिक्षा की दो समस्याओं को चर्चा हेतु सदन के समक्ष प्रस्तुत किया गया. प्रथम विषय दृ‘शिक्षा का विशुद्ध भारतीय अर्थायाम’ जिसे भारतीय शिक्षण मंडल की महिला प्रकोष्ठ की प्रमुख श्रीमती अरुणाशारश्वत ने प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि सरकारी धन पर शिक्षा की निर्भरता के कारण अब शिक्षा स्वतंत्र नहीं रही है साथ ही शिक्षा का व्यापारीकरण भी हुआ है. कई राज्यों में तो शिक्षा का 90 प्रतिशत तक व्यय वेतन पर ही हो जाता है. गुरुकुल शिक्षा पद्धति में शिक्षा  पूर्णतः निःशुल्क थी. शिक्षा के उपरांत गृहस्थ आश्रम में वापस आने के बाद व्यक्ति जीवन भर अपनी आय का 10 प्रतिशत अपने गुरुकुल को देता था लेकिन वर्तमान में शिक्षा के व्यापारीकरण के कारण क्षात्रों में ‘उपभोक्ता’ भावना घर कर गयी है. इस विषय पर अनेक विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों ने अपने सुझाव दिए। श्री मुकुल कानिटकर ने कहा कि यदि इस विधि को वर्तमान में लागू किया जाए तो विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक किसी को भी सरकार के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा. सभा में सर्वसम्मति से तीन कार्य बिंदु स्वीकार किये।
    1.  अपनी आय में से शिक्षा हेतु नियमित दान देंगे। संभव एवं आवश्यक हो तो अपने पूर्व विद्यालय, महाविद्यालय को स्वेच्छा से आय का निश्चित अंश दान करेंगे।
     
    2. समाज को इस पवित्र कार्य हेतु दान देने की प्रेरणा देंगे। गुरुकुलों, विद्यालयों की स्थापना हेतु भूमि, भवन आदि का दान समाज के सहयोग से प्राप्त करेंगे तथा सुयोग्य आचार्यों की आजीविका हेतु ‘आचार्य योगक्षेम निधि’ का निर्माण करेंगे। 
     
    3. अपने-अपने प्रदेशों में राज्य शासन को तथा सामूहिक रूप से केंद्र शासन को शिक्षा व्यवस्था में सामाजिक योगदान के लिए स्पष्ट नीति बनाने का आग्रह करेंगे। शिक्षा क्षेत्र में दानदाताओं को प्रोत्साहित करने करों में छूट का प्रावधान तथा अधिक से अधिक सामाजिक योगदान प्राप्त करनेवाले विद्यालय, महाविद्यालय को पुरस्कृत करने की व्यवस्था शासन द्वारा हो ऐसा आग्रह करेंगे।
    इस सत्र का दूसरा विषय ‘शिक्षा को परिणामकारी बनाने हेतु वातावरण निर्मिती’ को भारतीय शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष श्री बनवारी लाल नाटिया ने प्रस्तुत किया. इस विषय पर भी काफी विचार विमर्श हुआ लेकिन सदस्यों के और विचार करने की इच्छा व्यक्त की, जिसका सम्मान करते हुए इसकी अध्यक्षता कर रहे श्री मुकुल जी ने इस विषय रविवार को और विचार करने का समय दिया। इसके बाद प्रान्त अनुसार और क्षेत्र अनुसार सभी सदस्यों और पदाधिकारियों ने चर्चा की. भारतीय शिक्षण मंडल के तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन पूर्ण मंडल से स्वर्ण जयंती का कार्यक्रम एश्लोन प्राद्योगिकी संस्थान, फरीदाबाद में हो रहा हैए जिसका समापन रविवार को होगा।

    ( टुडे एक्सप्रेस न्यूज़ के लिए अजय वर्मा की रिपोर्ट )


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