जर्मनी की मेडिकल स्टूडेंट ने मानवता दिखा उठाया गरीब बच्चे के इलाज का खर्च

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Germany's medical student raised the cost of treatment of a poor child by showing humanity

टुडे एक्सप्रेस न्यूज़ । रिपोर्ट अजय वर्मा । फरीदाबाद: इंसानियत जिन्दा है। इसका उदहारण हाल ही में फरीदाबाद में देखने को मिला। जर्मनी से ट्रेनिंग के लिए आई वालंटियर मेडिकल स्टूडेंट एना ने फरीदाबाद की डबुआ कॉलोनी के स्लम एरिया में रहने वाले गंभीर बीमारी से ग्रस्त दो वर्षीय पीयूष कुमार (कृष्णा) के इलाज का सारा खर्च उठा कर इंसानियत की सच्ची मिसाल दी। इस दुर्लभ (रेयर) बीमारी का सफलतापूर्वक इलाज मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स में हुआ। हॉस्पिटल के ब्रेन एवं स्पाइन सर्जरी विभाग के डायरेक्टर डॉ. तरुण शर्मा ने बताया कि जर्मनी निवासी मेडिकल स्टूडेंट एना इस बच्चे को हमारे पास लेकर आई। यह बच्चा हाइड्रोकिफेलस (सिर के अंदर पानी भरना) बीमारी से ग्रस्त था। जन्मजात बीमारी के कारण बच्चे का सिर जन्म से ही सामान्य बच्चों की तुलना में काफी बड़ा था। सिर लगभग 8.5 किलोग्राम का था जबकि बच्चे के शरीर का कुल वजन 13.5 किलोग्राम था। बच्चा बेहोशी की हालत में था। इस बच्चे ने खाना-पीना बंद कर दिया था एवं पानी भी पिलाने पर उल्टी कर देता था। ये लक्षण सिर में पानी भरने की ओर इशारा करते हैं। बच्चा अपनी आंखें भी नहीं खोल पा रहा था। सामान्य तौर पर ब्रेन के अंदर का फ्लूइड स्पाइनल कॉर्ड की ओर जाता है। लेकिन इस केस में जहाँ से फ्लूइड ब्रेन से निकलकर स्पाइन में जाता है, उस जगह पर ब्लॉकेज था। इस कारण बच्चे के सिर में पानी भरा हुआ था और सिर बड़े फुटबॉल के साइज़ जितना हो गया था जिससे बच्चे के ब्रेन का डेवलपमेंट (विकास) रुक गया था। जाँच के बाद बड़ी सावधानी से वेंट्रिकुलोपेरिटोनियल (वीपी) शंट सर्जरी की गई। सर्जरी द्वारा आर्टिफिशियल यानि नया रास्ता बनाया गया और ब्रेन से पानी के बहाव को बाईपास किया गया। बच्चा 3 दिन हॉस्पिटल में रहा। स्वस्थ होने पर उसे डिस्चार्ज किया गया।

डॉ. तरुण शर्मा ने कहा कि यह केस काफी चुनौतीपूर्ण था क्योंकि बच्चा छोटा था और सिर बहुत बड़ा था। ऐसी स्थिति में एनेस्थीसिया भी बड़ी चुनौती होती है। ज्यादा लंबे समय का एनेस्थीसिया नहीं दिया जा सकता। इन बच्चों में सिर में पानी भरने के कारण ब्रेन की डेवलपमेंट नहीं होती है तो बेहोशी देने से बाहर नहीं आ पाते हैं। कई बार ऑपरेशन के बाद मरीज को मिर्गी के दौरे आने शुरू हो जाते हैं एवं ऐसे मरीज को लंबे समय तक आईसीयू में रखना पड़ता है। सौभाग्य से बच्चा वेंटिलेटर पर नहीं गया। सर्जरी भी एक तय समय के अंदर करनी होती है, हमने एक घंटे के अंदर सर्जरी की। ब्रेन के पानी को भी बहुत नियंत्रित तरीके से नीचे की तरफ निकाला गया। एक दम से पानी के निकलने से ब्रेन को नुकसान पहुँच सकता है। सिर की स्किन ज्यादा पतली होने के कारण सिर के पानी के लीकेज होने का खतरा भी था इसलिए बहुत ही सावधानी के साथ सर्जरी की गई। सर्जरी के 24 घंटे बाद ब्रेन के अंदर प्रेशर कम होने पर बच्चे ने खाना-पीना शुरू कर दिया। अब बच्चे ने आंखें खोलना, रोना भी शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जैसे-जैसे पानी ब्रेन से स्पाइन की तरफ जाएगा तो फिर सिर का साइज़ बढ़ना रुक जाएगा और ब्रेन डेवलप होना शुरू होगा। एक-डेढ़ साल के अंदर धीरे-धीरे बच्चे के सिर का साइज़ भी सामान्य हो जाएगा। अगर इलाज न होता तो अगले एक से डेढ़ महीने में बच्चे की जान जा सकती थी। सर्जरी सफल रही और अब बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। इस सर्जरी में ब्रेन एंड स्पाइन सर्जरी विभाग के एचओडी एवं सीनियर कंसल्टेंट डॉ. सचिन गोयल, एनेस्थीसिया डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. आर.के सिंह और डॉ. गौरव धीर का भी विशेष योगदान रहा।

बच्चे के ठीक होने पर माता-पिता ने हॉस्पिटल एवं डॉक्टरों के साथ-साथ जर्मन की मेडिकल स्टूडेंट एना का धन्यवाद किया क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण बच्चे का इलाज नहीं हो पा रहा था। इन हालात में एना ने बच्चे के इलाज के सारे खर्चे का स्वयं भुगतान किया, वहीं मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स की तरफ से भी इलाज में आर्थिक राहत प्रदान की गई। एना ने कृष्णा के माता-पिता को आगे के इलाज में भी आर्थिक मदद करने का आश्वासन दिया।

 

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