बीते मंगलवार, 21 जुलाई की दोपहर हरियाणा की राजनीति में एक ऐसा क्षण दर्ज हुआ, जिसे न किसी मंच की जरूरत थी और न किसी भाषण की। घड़ी में बारह से तीन बजे के बीच प्रदेश के 4,729 शक्ति केंद्रों पर कार्यकर्ता अपने-अपने घर से लाए टिफिन खोलकर एक ही मेज़ के इर्द-गिर्द बैठ गए। पिंजौर में मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी जी, राई में प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता जी और गन्नौर में संगठन महामंत्री श्री फणीन्द्रनाथ शर्मा जी भी उसी साझा पंक्ति का हिस्सा बने। मैं भी एक कार्यकर्ता के रूप में मैं भी एक टिफ़िन बैठक में था, और मैंने महसूस किया कि यह महज दोपहर का भोजन नहीं, बल्कि हमारे संगठन के भीतर बहने वाली उस भावना का खुला प्रमाण था जो इसे बाकी सबसे अलग खड़ा करती है। देश में और कहीं आपको ऐसा दृश्य नहीं मिलेगा। जिस पार्टी में मुख्यमंत्री अपने बूथ अध्यक्ष के बगल में बैठकर वही रोटी खाता है, जो उसके कार्यकर्ता की थाली में है, वह पार्टी पद को रुतबे की नहीं, दायित्व की भाषा में पढ़ती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का अंत्योदय दर्शन हमें यही सिखाता है कि विकास की असली कसौटी वह व्यक्ति है, जो पंक्ति में सबसे पीछे खड़ा है। मंगलवार की वह मेज़ इसी दर्शन का व्यावहारिक रूप थी, जहाँ ओहदे की दीवारें एक साझा टिफिन में पिघल गईं। विपक्ष के लिए राजनीति अब बयानों और सोशल मीडिया की पोस्ट तक सिमट गई है, जबकि हमारा कार्यकर्ता आज भी गली-मोहल्ले की धूल में डटा रहता है। और यहाँ आँकड़े किसी दावे के मोहताज नहीं हैं। प्रदेश के चारों हजार सात सौ उनतीस शक्ति केंद्र इतिहास में पहली बार एक ही तारीख और एक ही घंटे में एक साथ धड़के। हर केंद्र पर औसतन सोलह कार्यकर्ता, यानी लगभग सत्तर हजार लोग एक ही क्षण में सक्रिय। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमारा संगठन प्रशासन से भी आगे की सोचता है, तभी तो प्रदेश के तेईस प्रशासनिक जिलों के मुकाबले हमने अपने संगठन को सत्ताईस जिलों में पिरोया है, ताकि पहुँच का एक भी कोना अछूता न रहे। शक्ति केंद्रों की मासिक बैठकें हमारे लिए कोई नई बात नहीं, पर पूरे प्रदेश का एक ही सुर में, एक ही समय पर बैठना अपने आप में पहली घटना थी। जो संगठन अपने आखिरी बूथ तक को एक ही संकल्प के धागे में बाँध सकता है, उसकी ताकत पर उँगली उठाने से पहले विरोधियों को अपने ढाँचे की ओर झाँक लेना चाहिए। यह कथन हर बार सच उतरता है कि भाजपा बूथ पर टिकी पार्टी है, और कमजोर बूथ पर कोई मजबूत संगठन खड़ा नहीं हो सकता। इसी अनुशासन ने 2024 के विधानसभा चुनाव की 48 सीटों वाली निर्णायक जीत की नींव रखी थी। कुछ लोग इसे महज एक आयोजन कहकर किनारे रखना चाहेंगे। मेरा उनसे सीधा सवाल है, देश के कौन से दल में मुख्यमंत्री और बूथ अध्यक्ष एक ही थाली के सामने बैठ कर खाते हैं ? कौन एक ही दोपहर में डिजिटल प्रशिक्षण, बूथ समितियों के गठन, प्रधानमंत्री जी की ‘मन की बात’ के प्रसार और हर गतिविधि के पोर्टल पर लेखे-जोखे जैसे कामों को इतनी बारीकी से एक साथ अंजाम दे सकता है? जवाब सन्नाटे में ही छिपा है। दरअसल दूसरे दलों के लिए संगठन चुनाव आते ही याद आने वाली मजबूरी है, हमारे लिए यह हर दिन जीने की आदत है। इस साझा भोजन के पीछे केवल आपसी मेलजोल की मंशा नहीं है। इसका असली उद्देश्य ऊँच-नीच की रेखा मिटाना, बूथ समितियों में नई जान फूँकना, अपनी ही कमजोरियों को ईमानदारी से पहचानना और नेतृत्व तथा कार्यकर्ता की धड़कन को एक कर देना है। जिस दौर में विपक्ष झूठ और भ्रम की खेती कर रहा है, उस दौर में कार्यकर्ता का काम और भारी हो जाता है। उसे प्रमाणों के साथ केंद्र की मोदी सरकार और प्रदेश की डबल इंजन सरकार की योजनाओं को हर घर की चौखट तक ले जाना है। यह टिफिन बैठक उसी लड़ाई का रिहर्सल है, वह मैदान जहाँ कार्यकर्ता आने वाले हर मोर्चे के लिए खुद को माँजता है। यह पहल किसी एक दिन की रस्म नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के उस सूत्र का विस्तार है, जो उन्होंने पूरे देश को दिया। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ हमारे यहाँ दीवार पर टँगा कोई नारा नहीं, बल्कि काम करने का ढंग है। जब सबसे ऊपर बैठा मुख्यमंत्री और सबसे नीचे खड़ा बूथ अध्यक्ष एक ही टिफिन साझा करते हैं, तो ‘सबका साथ’ किताबों से निकलकर जमीन पर चलता हुआ दिखाई देता है। टिफिन देखने में मामूली चीज है, पर इसी मामूली से डिब्बे में हमारी सबसे बड़ी पूँजी बंद है। वह पूँजी है हमारा समर्पित कार्यकर्ता, जो राष्ट्र प्रथम के भाव से बँधा है और नेतृत्व तथा जनता के बीच पुल बनकर खड़ा रहता है। मंगलवार को हरियाणा ने ठीक यही देखा, एक ऐसा संगठन जो राजनीति करता है तो लीक से हटकर करता है, और इसीलिए औरों से बेहतर करता है। यही भारतीय जनता पार्टी की आत्मा है, और यही उसकी न टूटने वाली शक्ति का रहस्य भी।
— आभास अग्रवाल, प्रदेश मीडिया पैनलिस्ट, भाजपा
