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Home » 2014 में कैसे हुई जज्बा ग्रुप के रूप में एक सुहाने सफर की शुरुआत, छात्रों की पॉकेटमनी से कैसे चलता था संगठन? आज वो जज्बा फाउंडेशन के नाम से कैसे नई ऊंचाईयों को छू रहा है, जानें-

2014 में कैसे हुई जज्बा ग्रुप के रूप में एक सुहाने सफर की शुरुआत, छात्रों की पॉकेटमनी से कैसे चलता था संगठन? आज वो जज्बा फाउंडेशन के नाम से कैसे नई ऊंचाईयों को छू रहा है, जानें-

Ajay vermaBy Ajay verma15/05/2021No Comments5 Mins Read
ajay chaudharu 001

Today Express News / Ajay Verma / उस वक्त में ट्रेन में लटककर फरीदाबाद से दिल्ली पढ़ने जाया करता था। प्रधानमंत्री ने अक्तूबर 2014 में स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की थी पर रेलवे स्टेशनों पर उसका असर नहीं दिखता था। इसलिए कुछ दोस्तों को ये बात बताई और सबने मिलकर अभियान चलाने की ठानी और अपना एक ग्रुप बनाया। चूंकि हम सब एक जज्बे से इस अभियान को चलाने में एक साथ जुटे थे इसलिए इसे हमने “जज्बा” नाम दिया। हम अपने अभियानों में सिर्फ स्वच्छता नहीं विशेषकर स्वच्छता जागरूकता का काम करते थे। वो सब कैसे करते थे और कैसे हमने स्टेशनों को स्वच्छ करने में अपना योगदान कैसे दिया वो नीचे लिख रहा हूँ लेकिन सबसे जरूरी है उन साथियों के नाम जो शुरुआत से साथ जुड़े थे और इसे आगे लेकर चले।

सबसे पहला अभियान 4 दिसंबर 2014 को फरीदाबाद न्यू टाउन रेलवे स्टेशन पर चलाया था। जिसमें हम 7 साथी शामिल थे। जिनमें मेरे साथ विनोद, आलोक शर्मा, मुकेश कश्यप, योगेश खारी, लखन कुमार, गौतम कुमार थे।

फिर बाद के अभियानों में हमने अपना स्वरुप बड़ा किया और हमसे प्रभावित हो साथ के कई छात्र और साथी दोस्त जुड़ते चले गए। जिसमें रोहित शर्मा, खुशबू मिश्रा, सौरभ गोयल, दीपक चौहान, नित्यानंद, लतिका चुग, अमिता, रेनू पॉल, अनिल राय, चंचल, विक्रम वशिष्ठ, बबिता भारद्वाज, सुनीता भारद्वाज, नेहा, मनीष, शुभम वशिष्ठ, हिमांशु भट्ट, अरविंद, यतिन, शीतल खजुरिया और गौरव दुबे भी जुड़े।

विक्रम वशिष्ठ जब हमारे साथ जुड़े तब वो फ़ूड बैंक फरीदाबाद चलाते थे और हम उनके साथ जुड़कर स्टेशन पर खाना बांटते और फिर स्वच्छता जागरूकता अभियान चलाते। उनकी भी पूरी टीम का सहयोग हमें रहा। ऐसे करके 40 से अधिक सदस्यों की हमारी टीम बन गयी थी। जिन्होंने अपना योगदान इन अभियानों में दिया और हम सब ने समाज में जागरूकता फैला सेवा का एक स्वर्णिम युग जिया।

कैसे रेलवे स्टेशनों चला पर जज्बा ग्रुप का अभियान-

प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को साल भर होने को आया था और रेलवे स्टेशन पर उसका असर न के बराबरजज्बा ग्रुप था। उनके अभियान का असर इतना था कि रेलवे स्टेशनों पर डस्टबीन लगा दिए गए। रोज झाडू भी लगती बावजूद इसके स्टेशन पर गंदगी कम नहीं हुई। क्योंकि कमी लोगो की आदत में थी और हमने लोगों को एक मैसेज देने का ठाना और सफाई जागरुकता अभियान की शुरुआत की।

अभियान चलाने से पहले रोज स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार करते हुए गंदगी के कारण को पहचाना और उसपर अभियान चलाने की ठानी लोगों की राय के लिए एक ब्लॉग भी लिखा उसका लिंक ये रहा- https://phirbhimuskuratizindagi.wordpress.com/2014/11/29/मुंगफली-और-स्वच्छ-भारत-अभ/

वो सर्दियों का वक्त था और लोग मुंगफलिया खाकर पूरा स्टेशन भर देते थे। उसके लिए हमने ऐसे लोगों को कागज का लिफाफा देना शुरु किया और बाकी पैकेट और चाय के गिलास आदि हम लोगों के पैरों में से उठाकर डस्टबीन में डाला करते थे। कईं लोग हमारे हाथ पकड लेते और कहते ये हम खुद डाल देंगे। हमने रेलवे स्टेशन पर ऐसे बहुत सारे स्वच्छता जागरुकता अभियान चलाए। इनके पीछे मकसद लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरुकता लानी ही थी। क्योंकि डस्टबीन होने और सफाई कर्मचारी होने के बावजूद रेलवे स्टेशन पर सफाई नहीं हो पा रही थी। क्योंकि एक ट्रेन का समय होते ही उसमें जाने वाले यात्री आकर स्टेशन गंदा कर जाते थे। इस अभियान के दौरान हमें जो लोग खुद से डस्टबीन में उठकर कूडा लगाते दिखाई देते हम उन्हें पुरुस्कार स्वरुप एक पेन गिफ्ट करते।

ये अभियान हमने फरीदाबाद न्यू टाउन रेलवे स्टेशन से लेकर बल्लबगढ़, ओल्ड फरीदाबाद और दिल्ली के तुग़लकाबाद रेलवे स्टेशन तक चलाया। सबसे अधिक ये ओल्ड फरीदाबाद रेलवे स्टेशन पर चलाया गया। जिसमें स्टेशन के पूरे स्टाफ का हमें दिल से साथ मिलता। वो हर पल हमारी सहायता के लिए वहां खड़े रहते। हमसे प्रभावित हो कई सामाजिक संगठनों ने स्टेशन को नई डस्टबिन भी दान दी थी।

अभियान में सभी छात्र थे इसलिए सभी उस वक्त मिलकर अपनी पॉकेट मनी से इसको चलाने में आने वाले छोटे खर्चों को उठाते थे। खर्चे में आई कार्ड से लेकर गिफ्ट करने वाले पेन, लिफाफे, हैंड ग्लब्स आदि ही थे। हमने इस अभियान में बाद में फ़ूड बैंक फरीदाबाद के साथ मिलकर खाना बांटने और क्लॉथ बैंक फरीदाबाद के नाम से एक ग्रुप बना सर्दियों में गरीबों को कपड़े बांटने का काम भी किया।

ये अभियान करीब 4 सालों तक जारी रहे और साथ के सभी छात्र धीरे धीरे नौकरी से लेकर अपने बिजनेस में शिफ्ट हो गए और मैं भी मीडिया को ही समाज सेवा मान अपना सारा समय इसमें देने लगा।

2015 में हमारे साथ अभियानों में जुड़े हिमांशु भट्ट ने 2018 में मुझसे मिलकर एक बेहतरीन अनुरोध किया कि ग्रुप की एक्टीविटीस बंद पडी हैं और मैं इसे आगे ले जाना चाहता हूं और इसलिए मैं इसे रजिस्टर कराना चाहता हूं। हमने उसे इजाजत दी क्योकिं ग्रुप के अन्य सदस्य कोई नौकरी पर लग गया था कोई मुम्बई या फिर अपने बिजनेस में यहां से दूर शिफ्ट हो चुका था। इसलिए हिमांशु के जज्बे को समझते हुए जरूरी समझा कि ये आगे बढ़े और हां भर दी।

आज हिमांशु भट्ट संगठन को आगे बढ़ाते हुए इसे जज्बा फाउंडेशन के नाम से चलाता है। जिसमें आज हमारा योगदान के रूप में सिर्फ नाम, logo और अखबार की कुछ कतरन के साथ सिर्फ आशीर्वाद ही है। बाकी सब मेहनत ये युवा साथी खुद कर रहे हैं और जज्बा फाउंडेशन को आगे बढ़ा रहे हैं। अब संगठन रजिस्टर भी हो गया है जो पूरी तरह हिमांशु ही देख रहा है। संगठन ने पिछले दिनों महारक्तदान शिविर लगाया था, पिछले लॉकडाउन में उन्होंने गरीबों को खाना व मास्क बांटने का काम भी किया था। अब भी वो इस कोरोना काल जैसे कठिन समय में प्लाजमा डोनेशन जैसे महत्वपूर्ण कार्य में लगे हैं। युवाओं का संगठन समय के साथ अपना स्वरूप बदलकर आज भी निरंतर आगे बढ़ रहा है। हिमांशु और उसकी टीम को आगे बढ़ने के लिए शुभकामनाएं, ऐसे ही नाम रोशन करते रहो।

अजय चौधरी

 

Photo by jajba –

 

 

जज्बा ग्रुप
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