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    मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फ़रीदाबाद ने थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के साथ विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया

    Ajay vermaBy Ajay verma03/05/2024No Comments6 Mins Read

    टुडे एक्सप्रेस न्यूज़ | ब्यूरो रिपोर्ट। मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फ़रीदाबाद ने हर वर्ष 8 मई 2024 को आने वाला विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाया। इस वर्ष का विषय है “जीवन को सशक्त बनाते हुए, प्रगति को अपनाते हुए: सभी के लिए थैलेसीमिया का न्यायोचित और सुलभ इलाज”। सेंटर फ़ॉर बोन मैरो ट्रांसप्लांट के प्रमुख हैं, डॉ. मीत कुमार, क्लिनिकल डायरेक्टर, हेमेटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स। मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फ़रीदाबाद ने फाउंडेशन अगेनस्ट थैलेसीमिया के सहयोग से विश्व थैलेसीमिया दिवस का उत्सव मनाया। इस फाउंडेशन के अध्यक्ष, श्री रविंदर डुडेजा, एक अत्यंत सक्रिय सदस्य रहे हैं और उन्होंने थैलेसीमिया के रोगियों के लिए तन्मयता से काम किया है। इस कार्यक्रम में थैलेसीमिया से पीड़ित लगभग 60 बच्चों ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री राकेश आर्य, कमिश्नर, फरीदाबाद, आई.पी.एस. थे।

    थैलेसीमिया ख़ून का एक वंशानुगत विकार है जो हीमोग्लोबिन के बनने में कमी के कारण होता है। यह ख़ून की एक आनुवंशिक बीमारी है जो शरीर में हीमोग्लोबिन का उत्पादन करने की क्षमता को कम कर देती है, जो पूरे शरीर की लाल रक्त कोशिकाओं में ऑक्सीजन ले जाने के लिए आवश्यक प्रोटीन होता है। इस कमी के परिणामस्वरूप एनीमिया होता है, जो थकान, कमज़ोरी और विभिन्न प्रकार की जटिलताओं के जैसे लक्षण पैदा करता है। थैलेसीमिया दो रूपों में पाया जाता है: अल्फा और बीटा। केवल लगभग 10% लोगों को ख़ून से संबंधित बीमारियों के लक्षण और उपचार के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी है।
    ख़ून की यह बीमारी शरीर के बिगड़ते हुए स्वास्थ्य वाले रोगियों के जीवन पर बहुत अधिक प्रभाव डालती है। मरीज़ों को थकावट, कमज़ोरी, साँस लेने में समस्या, हड्डियों का टेढ़ापन और शरीर के विकास में विलंब का अनुभव होता है। लगातार इलाज करवाने की आवश्यकता रोगी को मनोवैज्ञानिक रूप से प्रभावित करती है और उनके सामाजिक जीवन को भी ख़राब कर देती है। आर्थिक रूप से, इसका परिवार पर प्रभाव पड़ता है क्योंकि इससे आर्थिक बोझ पड़ता है और सहायता प्रणाली पर वित्तीय दबाव पड़ता है।
    ख़ून के विकारों के सामान्य लक्षण जिनके लिए बी.एम.टी. की आवश्यकता होती है, उनमें थैलेसीमिक के रोगी शामिल हैं जिन्हें छह महीने की उम्र से हर महीने ख़ून को बदलने की आवश्यकता होती है, एप्लास्टिक एनीमिया के रोगियों में कमज़ोरी, थकान, लगातार बुखार या शरीर पर रक्तस्राव के धब्बे होते हैं, और रक्त कैंसर के रोगियों में कमज़ोरी, थकान, संक्रमण के अधिक खतरे, और रक्तस्राव का अनुभव होता है।
    डॉ मीत कुमार, क्लिनिकल डायरेक्टर, हेमेटोलॉजी और बोन मैरो ट्रांसप्लांट, मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स ने कहा, “विश्व थैलेसीमिया दिवस का उत्सव मनाने का महत्व उसके लक्षणों, कारणों और किसी मरीज़ द्वारा प्राप्त किए जा सकने वाले उपचार के समाधानों के बारे में जागरूकता बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह दिन बेहतरीन स्वास्थ्य देखभाल तक और भी अच्छी पहुँच, नए उपचारों के उपयोग और जीन थेरेपी के बारे में जागरूकता का समर्थन करने के महत्व को भी दर्शाता है। विश्व थैलेसीमिया दिवस मनाने से रोगियों और उनके परिवारों के बीच समाज और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिलता है। यह दिन बोन मैरो ट्रांसप्लांट के महत्व को भी बढ़ाता है जो थैलेसीमिक रोगियों के लिए एक सबसे बड़ा इलाज है। हमने विभिन्न प्रकार की बीमारियों और विकारों से पीड़ित सभी रोगियों की सुविधा, सहयोग और सम्मान के लिए फरीदाबाद और गुरुग्राम के लिए रक्त के स्वास्थ्य की एक पहल ‘रक्तवीर अभियान’ भी शुरू किया है।”
    मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स के प्रबंध निदेशक और समूह के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. राजीव सिंघल ने कहा, “मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल जागरूकता के इस आयोजन के जैसे प्रयास के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य की चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। ख़ून के विकारों को ठीक करने के लिए अत्याधुनिक उपचार के तौर-तरीकों की समझ और प्रतिक्रिया को तटस्थ बनाकर, यह अस्पताल सक्रिय रूप से एक अधिक शक्तिशाली, प्रबुद्ध एवं लचीले समाज के निर्माण में योगदान देता है, जो ऐसी जानलेवा बीमारियों की प्रतिकूल परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए बेहतर तरीक़े से तैयार हो।”
    डॉ. नीरज तेवतिया, वरिष्ठ सलाहाकार, पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजिस्ट, बी.एम.टी. एंड हेमेटोलॉजी ने कहा, “हेमेटोलॉजी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन में प्रगति के साथ, बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बी.एम.टी.) उपचारहीन और संभावित घातक विकारों के लिए भी सबसे अच्छा जीवन रक्षक समाधान बन गया है। अस्थि मज्जा रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए उत्तरदायी होता है, और बी.एम.टी. में क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए अस्थि मज्जा को स्वस्थ कोशिकाओं से बदलना शामिल होता है।”
    फाउंडेशन अगेनस्ट थैलेसीमिया के संस्थापक, श्री रविंदर डुडेजा ने कहा, “ख़ून की बीमारियाँ कैंसर के सबसे घातक रूपों में से एक होती है जिनका जीवन की गुणवत्ता पर अत्यंत गंभीर प्रभाव पड़ता है। इन बीमारियों को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के माध्यम से स्थायी रूप से ठीक किया जा सकता है, इस बात के प्रति जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है। हाल में हुई तकनीकी प्रगति के साथ, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसी पारंपरिक इलाजों के विफल होने पर अब विभिन्न प्रकार के कैंसरों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बी.एम.टी.) से सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है।”
    मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स फ़रीदाबाद के रीजनल डायरेक्टर डॉ. अजय डोगरा ने कहा, “‘पेशेंट फ़र्स्ट’ की हमारी पहल पर आधारीत हमारे प्रयास में हमारा लक्ष्य ख़ून से संबंधित बीमारियों की बढ़ती घटनाओं और उपचार के अत्याधुनिक तौर-तरीकों के बारे में जागरूकता को बढ़ाना है। हमारा लक्ष्य जनता को उन विकारों और बीमारियों के बारे में सही जानकारी प्रदान करना है जिनका जीवन पर प्रभाव पड़ सकता है। निवारक उपायों का अनुमोदन/प्रारंभिक लक्षणों को पहचानने और उपचार के अत्याधुनिक तौर-तरीकों में अधिक जानकारी के प्रसार के माध्यम से, हमारे अभियान में इस बीमारी की व्यापकता को कम करना शामिल है।”
    भारत में, अब हर वर्ष लगभग 2,500 से 3,000 बोन मैरो ट्रांसप्लांट्स (बी.एम.टी.) किए जाते हैं, जबकि 5 वर्ष पहले यह आँकड़ा केवल 500 ही था। हालाँकि, किए जा रहे प्रत्यारोपणों की संख्या से बी.एम.टी. की आवश्यकता कहीं अधिक है। यह कमी मुख्यतः जागरूकता की कमी, अपर्याप्त आधारभूत ढाँचे और कुशल चिकित्सकों की कम संख्या के कारण है। बी.एम.टी. का संकेत विभिन्न प्रकार की अवस्थाओं के लिए दिया जाता है, जिनमें ख़ून का कैंसर, थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया, रोग-प्रतिररोधक क्षमता की कमी, एप्लास्टिक एनीमिया, कुछ ऑटोइम्यून विकार और, हाल ही में, कुछ ठोस ट्यूमर जैसे मस्तिष्क ट्यूमर, न्यूरोब्लास्टोमा और सारकोमा शामिल हैं।
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