कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 पर वेबिनार का हुआ आयोजन -लिंग्याज विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) में लॉ डिपार्टमेंट ने जागरूकता अभियान चलाया

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टुडे एक्सप्रेस न्यूज़। रिपोर्ट अजय वर्मा। फरीदाबाद, 11 दिसम्बर – लिंग्याज विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) के लॉ डिपार्टमेंट द्वारा कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 पर वेबिनार का आयोजन किया गया। हेड ऑफ लॉ स्कूल प्रोफेसर (डॉ.) मोनिका रस्तोगी ने बताया कि इस अवसर पर एडवोकेट विनीता सैनी (विधिक परामर्शदात्री जे के एल एस लॉ फर्म, जयपुर) मुख्य वक्ता रही। जिन्होंने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013 पर विस्तार से चर्चा करते हुए इसके सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला।

एडवोकेट विनीता सैनी ने अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों पर चर्चा करते हुए बताया कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का प्रभाव दूरगामी होता है और यह महिलाओं के समान अधिकार पर चोट है। इसका न केवल उन पर प्रभाव पड़ता है, बल्कि कार्यस्थल की उत्पादकता के साथ-साथ समाज के विकास पर भी सीधा असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि कौन से कृत्य कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न की परिभाषा के अंर्तगत आते हैं तथा कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होने पर पीड़िता को कौन से उपचार उपलब्ध हैं एवं किस प्रकार इस कृत्य के विरुद्ध आंतरिक कमेटी के साथ-साथ भारतीय दण्ड संहिता के अपराध के लिए भी न्यायालय के समक्ष परिवाद किया जा सकता  है।

advocate vinita saini
advocate vinita saini

उन्होंने बताया कि किसी महिला के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होने के बारे में आंतरिक समिति जांच करने के पश्चात यदि शिकयत सही पाती है तो जिसने यह कृत्य किया है उसको नौकरी से भी निकाला जा सकता है और यदि शिकयत झूठी पाई जाती है तो शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी कार्यवाही की जा सकती है।

हेड ऑफ लॉ स्कूल प्रोफेसर (डॉ.) मोनिका रस्तोगी ने बताया कि यह कार्यक्रम यूनिवर्सिटी चांसलर डॉ. पिचेश्वर गड्डे एवं प्रो चांसलर प्रोफेसर (डॉ.) एम. के. सोनी की प्रेरणा के द्वारा सफल बनाया जा सका। इस कार्यक्रम की सफलता पर रेजिस्ट्रार प्रेम कुमार सालवान और अकैडमिक डीन प्रोफेसर (डॉ.) सीमा बुशरा ने सभी स्टाफ सदस्यों को बधाई दी। इस कार्यक्रम को सफल बनाने में विवेक गुप्ता, डॉ. अंजली दीक्षित, शिल्पा शर्मा, शिवेंद्र कुमार, रुचि कौशिक, मोहिनी तनेजा, स्वेक्षा भदौरिया, डॉ. सुरेश नागर और दुर्गेन्द्र सिंह राजपूत का योगदान महत्वपूर्ण रहा।

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